Skip to main content

Followers

श्री कृष्ण और दुर्योधन थे समधी

Related image
महाभारत के युद्ध में कौरवों के विरूद्ध पांडवों का साथ देने वाले श्री कृष्ण दुर्योधन के समधी थे। श्री कृष्ण के पुत्र ने दुर्योधन की पुत्री का हरण कर विवाह किया था।बात यूँ है की दुर्योधन के एक पुत्री थी जिसका नाम लक्ष्मणा था। जब लक्षमणा बड़ी हुई तो दुर्योधन ने उसका विवाह करने के लिए एक स्वयंवर का आयोजन किया। उस स्वयंवर में बहुत से वीर पराक्रमी राज कुमार उपस्थित हुए। पर राजकुमारी लक्ष्मणा, राजकुमार साम्ब को चाहती थी जो की श्री कृष्ण और रानी जाम्बवती के पुत्र थे। साम्ब और लक्ष्मणा पहले से ही एक दूसरे से प्यार करते थे और वो यह भी जानते थे की कौरव यह विवाह नहीं होने देंगे। इसलिए साम्ब ने  स्वयंवर से पहले ही  लक्ष्मणा का हरण कर लिया। साम्ब जब लक्ष्मणा का हरण करके जाने लगा तो कौरवों ने उसका पीछा किया और उसे पकड़कर बंदी बना लिया।
जब साम्ब को बंदी बनाने की बात द्वारका पहुंची तो सारे यदुवंशी कौरवों के साथ युद्ध करने की तैयारी करने लगे, लेकिन श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम ने उन्हें रोक दिया और कहाँ की मैं स्वयं हस्तिनापुर जाकर उन्हें ले के आयूंगा।बलराम ने हस्तिनापुर पहुंचकर कौरवों से साम्ब व लक्ष्मणा को उनके साथ ससम्मान द्वारका भेजने का आग्रह किया जिसे कौरवों ने ठुकरा दिया तथा बलराम का खूब अपमान किया।  अपने अपमान और कौरवों के अहंकार से क्रोधित होकर बलराम ने अपने हल से हस्तिनापुर को धरती से उखाड़ दिया और उसे गंगा नदी में डुबोने के लिए गंगा नदी की और खीचने लगे।
कौरवों ने जब यह देखा की बलराम अपने पराक्रम से समस्त हस्तिनापुर को गंगा में डुबो देंगे तो उन्होंने बलराम से माफ़ी मांगी और साम्ब व लक्ष्मणा को पति-पत्नी के रूप में उनके साथ विदा किया। इस तरह दुर्योधन और श्री कृष्ण समधी बने।

Comments

Popular posts from this blog

आप जानते हैं बागेश्‍वर धाम का रहस्‍य

  पुरा कथाओं में भगवान शिव के बाघ रूप धारण करने वाले इस स्थान को व्याघ्रेश्वर तथा बागीश्वर से कालान्तर में बागेश्वर के रूप में जाना जाता है।[1] शिव पुराण के मानस खंड के अनुसार इस नगर को शिव के गण चंडीश ने शिवजी की इच्छा के अनुसार बसाया था।[2][3] स्कन्द पुराण के अन्तर्गत बागेश्वर माहात्म्य में सरयू के तट पर स्वयंभू शिव की इस भूमि को उत्तर में सूर्यकुण्ड, दक्षिण में अग्निकुण्ड के मध्य (नदी विशर्प जनित प्राकृतिक कुण्ड से) सीमांकित कर पापनाशक तपस्थली तथा मोक्षदा तीर्थ के रूप में धार्मिक मान्यता प्राप्त है। ऐतिहासिक रूप से कत्यूरी राजवंश काल से (७वीं सदी से ११वीं सदी तक) सम्बन्धित भूदेव का शिलालेख इस मन्दिर तथा बस्ती के अस्तित्व का प्राचीनतम गवाह है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार सन् १६०२ में राजा लक्ष्मी चन्द ने बागनाथ के वर्तमान मुख्य मन्दिर एवं मन्दिर समूह का पुनर्निर्माण कर इसके वर्तमान रूप को अक्षुण्ण रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।[4] उन्होंने बागेश्वर से पिण्डारी तक लगभग ४५ मील (७० किमी.) लम्बे अश्व मार्ग के निर्माण द्वारा दानपुर के सुदूर ग्राम्यांचल को पहुँच देने का प्रयास भी कि...

बागेश्वर धाम कैसे जाएं? छतरपुर, बागेश्वर धाम

  अगर आप अध्यात्म से जुड़ना चाहते हैं और अपने सांसारिक समस्याओं से निजात पाना चाहते हैं तो बागेश्वर धाम की यात्रा कर सकते हैं। वहां जाकर बालाजी महाराज से अर्जी लगाने पर हनुमान जी की कृपा से आपकी सारी दुख परेशानियां दूर हो जाती हैं। बागेश्वर धाम में स्वयंभू हनुमान जी यानी कि बालाजी महाराज का दिव्य मंदिर हैं, जहां लाखों लोग अपनी अर्जियां लगाने जाते हैं और अपनी समस्याओं तथा दुखों से निजात पाते हैं। पण्डित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी इसी बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर हैं, जिन्हें बागेश्वर धाम सरकार के नाम से भी जाना जाता है। इन दिनों बागेश्वर धाम सरकार के साथ-साथ बागेश्वर धाम भी पूरे भारत में विख्यात हो गया है। इस धाम की महिमा ही ऐसी है कि आज हर कोई यहां जाकर बालाजी महाराज के दर्शन करना चाहता है और अपनी अर्जी लगाना चाहता है। कहा जाता है कि बागेश्वर धाम में बालाजी महाराज अपने भक्तों की अर्जियां बागेश्वर धाम सरकार यानी कि पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के माध्यम से सुनते हैं और उनके ही माध्यम से अपने भक्तों की समस्याओं का समाधान भी करवाते हैं। अगर आप भी बागेश्वर धाम के बारे में अधिक जानकारी च...

भागवत पुराण

भागवत पुराण भागवत पुराण हिन्दुओं के अट्ठारह पुराणों में से एक है। इसे श्रीमद्भागवतम् या केवल भागवतम् भी कहते हैं। इसका मुख्य वर्ण्य विषय भक्ति योग है, जिसमें कृष्ण को सभी देवों का देव या स्वयं भगवान के रूप में चित्रित किया गया है। इसके अतिरिक्त इस पुराण में रस भाव की भक्ति का निरुपण भी किया गया है। परंपरागत तौर पर इस पुराण के रचयिता वेद व्यास को माना जाता है। श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मय का मुकुटमणि है। भगवान शुकदेव द्वारा महाराज परीक्षित को सुनाया गया भक्तिमार्ग तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोक में श्रीकृष्ण-प्रेम की सुगन्धि है। इसमें साधन-ज्ञान, सिद्धज्ञान, साधन-भक्ति, सिद्धा-भक्ति, मर्यादा-मार्ग, अनुग्रह-मार्ग, द्वैत, अद्वैत समन्वय के साथ प्रेरणादायी विविध उपाख्यानों का अद्भुत संग्रह है। परिचय अष्टादश पुराणों में भागवत नितान्त महत्वपूर्ण तथा प्रख्यात पुराण है। पुराणों की गणना में भागवत अष्टम पुराण के रूप में परिगृहीत किया जाता है (भागवत 12.7.23)। भागवत पुराण में महर्षि सूत जी उनके समक्ष प्रस्तुत साधुओं को एक कथा सुनाते हैं। साधु लोग उनसे विष्णु के विभिन्न अवतारों के बारे में प...