Skip to main content

Followers

Story Of Colors: कहानी रंगों की, हर रंग कुछ कहता है

 



मानव सभ्यता में रंगों का काफ़ी महत्व रहा है। हर सभ्यता ने रंगों को अपने तरीक़े से अपनाया। दुनिया में रंगों के इस्तेमाल को जानना भी बेहद दिलचस्प है। कई सभ्यताओं को उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों की वजह से ही पहचाना गया।

विक्टोरियन काल में ज़्यादातर लोग काला या स्लेटी रंग इस्तेमाल करते थे। एक तरह से ये रंग इनकी पहचान थे। फ़िरऔन हमेशा काले कपड़े पहनता था। वैसे भी हर रंग के अपने सकारात्मक और नकारात्मक असर होते हैं। इसलिए यह नहीं कर सकते कि काला रंग हमेशा बुरा ही होता है। हालांकि कई सभ्यताओं में इसे शोक का रंग माना जाता है।

शिया मोहर्रम के दिनों में ज़्यादातर काले कपड़े ही पहनते हैं। विरोध जताने के लिए भी काले रंग का इस्तेमाल किया जाता है, जैसे काले झंडे दिखाना, सर पर काला कपड़ा या काली पट्‌टी बांध लेना।

महान दार्शनिक अरस्तु ने 4 ईसा पूर्व में नीले और पीले रंगों की गिनती शुरुआती रंगों में की। उन्होंने इसकी तुलना प्राकृतिक वस्तुओं से की, जैसे सूरज-चांद और दिन-रात आदि। उस वक़्त ज़्यादातर कलाकारों ने उनके सिद्धांत को माना और तक़रीबन दो हज़ार साल तक इसका असर देखने को मिला। इसी बीच मेडिकल प्रेक्टि्‌स के पितामाह कहे जाने वाले 11वीं शताब्दी के ईरान के चिकित्सा विशेषज्ञ हिप्पोकेट्‌स ने अरस्तु के सिद्धांत से अलग एक नया सिद्धांत पेश किया।

उन्होंने रंगों का इस्तेमाल दवा के तौर पर किया और इसे इलाज के लिए बेहतर ज़रिया क़रार दिया। उनका मानना था कि सफ़ेद फूल और वॉयलेट फूल के अलग-अलग असर होते हैं। उन्होंने एक और सिद्धांत दिया, जिसके मुताबिक़ हर व्यक्ति की त्वचा के रंग से भी उसकी बीमारी का पता लगाया जा सकता है और रंगों के ज़रिये ही इसका इलाज भी मुमकिन है। उन्होंने इसका ख़ूब इस्तेमाल भी किया।


15वीं शताब्दी में स्विट्‌जरलैंड के चिकित्सक वॉन होहेनहैम ने ह्यूमन स्टडी पर काफ़ी शोध किया, लेकिन उनके तरीक़े हमेशा विवादों में रहे। उन्होंने ज़ख्म भरने के लिए रंगों का इस्तेमाल किया। 17-18वीं शताब्दी में न्यूटन के सिद्धांत ने अरस्तु के विशेष रंगों को सामान्य रंगों में बदल दिया। 1672 में न्यूटन ने रंगों पर अपना पहला परचा पेश किया। यह काफ़ी विवादों में रहा, क्योंकि अरस्तु के सिद्धांत के बाद इसे स्वीकार करना इतना आसान नहीं था।


रंगों के विज्ञान पर काम करने वाले लोगों में जॉन्स वॉल्फगैंग वॉन गौथे भी शामिल थे। उन्होंने न्यूटन के सिद्धांत को पूरी तरह नकारते हुए थ्योरी ऑफ कलर पेश की। उनके सिद्धांत अरस्तु की थ्योरी से मिलते जुलते थे।

उन्होंने कहा कि अंधेरे में से सबसे पहले नीला रंग निकलता है, वहीं सुबह के उगते हुए सूरज की किरणों से पीला रंग सामने आता है। नीला रंग गहरे रंगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि पीला रंग हल्के रंगों का। 19वीं शताब्दी में कलर थैरेपी का असर कम हुआ, लेकिन इसके बाद 20वीं शताब्दी में यह नए रूप में सामने आया।

आज भी कई चिकित्सक कलर थैरेपी को इलाज का अच्छा ज़रिया मानते हैं और इससे अनेक बीमारियों का उपचार भी करते हैं।

आयुर्वेद चिकित्सा में भी रंगों का विशेष महत्व है। रंग चिकित्सा के मुताबिक़ शरीर में रंगों के असंतुलन के कारण ही बीमारियां पैदा होती हैं। रंगों का समायोजन ठीक करके बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। ऑस्टवाल्ड ने आठ आदर्श रंगों को विशेष क्रम में संयोजित किया। इस चक्र को ऑस्टवाल्ड वर्ण कहा जाता है। इसमें पीला, नारंगी, लाल, बैंगनी, नीला, आसमानी, समुद्री हरा और हरा रंग शामिल है। 60 के दशक में एंथ्रोपॉलिजिस्ट्‌स केन ने रंगों पर अध्ययन किया। उनके मुताबिक़ सभी सभ्यताओं ने रंगों को दो वर्गों में बांटा-पहला हल्के रंग और दूसरा गहरे रंग।

कौन-सा रंग क्या कहता है?

मूल रूप से इंद्रधनुष के सात रंगों को ही रंगों का जनक माना जाता है। ये सात रंग हैं लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैंगनी। लाल रंग को रक्त रंग भी कहते हैं, क्योंकि ख़ून का रंग लाल होता है। यह शक्ति का प्रतीक है, जो जीने की इच्छाशक्ति और अभिलाषा को बढ़ाता है। यह प्रकाश का संयोजी प्राथमिक रंग है, जो क्यान रंग का संपूरक है। यह रंग क्रोध और हिंसा को भी दर्शाता है। हरा रंग प्रकृति से जुड़ा है। यह ख़ुशहाली का प्रतीक है।

हमारे जीवन में इसका बहुत महत्व है। यह प्राथमिक रंग है। हरे रंग में ऑक्सीजन, एल्यूमीनियम, क्रोमियम, सोडियम, कैल्शियम, निकिल आदि होते हैं। इस्लाम में इसे पवित्र रंग माना जाता है। नीला रंग आसमान का रंग है। यह विशालता का प्रतीक है। भारत का क्रीड़ा रंग भी नीला ही है। यह धर्मनिरपेक्षता का भी प्रतीक है। यह एक संयोजी प्राथमिक रंग है।

इसका संपूरक रंग पीला है। गहरा नीला रंग अवसाद और निराशा को भी प्रकट करता है। पीला रंग ख़ुशी और रंगीन मिज़ाजी को दर्शाता है। यह आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह वैराग्य से भी संबंधित है। हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व है। विष्णु और कृष्ण को यह रंग प्रिय है। बसंत पंचमी तो इसी रंग से जुड़ा पर्व है। डल पीला रंग ईर्ष्या को दर्शाता है। स़फेद रंग पवित्रता और निर्मलता का प्रतीक माना जाता है। यह शांति और सुरक्षा का भाव पैदा करता है। यह अकेलेपन को भी प्रकट करता है। काला रंग रहस्य का प्रतीक है। यह बदलाव से रोकता है। यह नकारात्मकता को भी दर्शाता है।

Comments

Popular posts from this blog

बागेश्वर धाम कैसे जाएं? छतरपुर, बागेश्वर धाम

  अगर आप अध्यात्म से जुड़ना चाहते हैं और अपने सांसारिक समस्याओं से निजात पाना चाहते हैं तो बागेश्वर धाम की यात्रा कर सकते हैं। वहां जाकर बालाजी महाराज से अर्जी लगाने पर हनुमान जी की कृपा से आपकी सारी दुख परेशानियां दूर हो जाती हैं। बागेश्वर धाम में स्वयंभू हनुमान जी यानी कि बालाजी महाराज का दिव्य मंदिर हैं, जहां लाखों लोग अपनी अर्जियां लगाने जाते हैं और अपनी समस्याओं तथा दुखों से निजात पाते हैं। पण्डित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी इसी बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर हैं, जिन्हें बागेश्वर धाम सरकार के नाम से भी जाना जाता है। इन दिनों बागेश्वर धाम सरकार के साथ-साथ बागेश्वर धाम भी पूरे भारत में विख्यात हो गया है। इस धाम की महिमा ही ऐसी है कि आज हर कोई यहां जाकर बालाजी महाराज के दर्शन करना चाहता है और अपनी अर्जी लगाना चाहता है। कहा जाता है कि बागेश्वर धाम में बालाजी महाराज अपने भक्तों की अर्जियां बागेश्वर धाम सरकार यानी कि पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के माध्यम से सुनते हैं और उनके ही माध्यम से अपने भक्तों की समस्याओं का समाधान भी करवाते हैं। अगर आप भी बागेश्वर धाम के बारे में अधिक जानकारी च...

भागवत पुराण

भागवत पुराण भागवत पुराण हिन्दुओं के अट्ठारह पुराणों में से एक है। इसे श्रीमद्भागवतम् या केवल भागवतम् भी कहते हैं। इसका मुख्य वर्ण्य विषय भक्ति योग है, जिसमें कृष्ण को सभी देवों का देव या स्वयं भगवान के रूप में चित्रित किया गया है। इसके अतिरिक्त इस पुराण में रस भाव की भक्ति का निरुपण भी किया गया है। परंपरागत तौर पर इस पुराण के रचयिता वेद व्यास को माना जाता है। श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मय का मुकुटमणि है। भगवान शुकदेव द्वारा महाराज परीक्षित को सुनाया गया भक्तिमार्ग तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोक में श्रीकृष्ण-प्रेम की सुगन्धि है। इसमें साधन-ज्ञान, सिद्धज्ञान, साधन-भक्ति, सिद्धा-भक्ति, मर्यादा-मार्ग, अनुग्रह-मार्ग, द्वैत, अद्वैत समन्वय के साथ प्रेरणादायी विविध उपाख्यानों का अद्भुत संग्रह है। परिचय अष्टादश पुराणों में भागवत नितान्त महत्वपूर्ण तथा प्रख्यात पुराण है। पुराणों की गणना में भागवत अष्टम पुराण के रूप में परिगृहीत किया जाता है (भागवत 12.7.23)। भागवत पुराण में महर्षि सूत जी उनके समक्ष प्रस्तुत साधुओं को एक कथा सुनाते हैं। साधु लोग उनसे विष्णु के विभिन्न अवतारों के बारे में प...

भागवत कथा सुनने से होता है मन का शुद्धिकरण

भागवत कथा सुनने से होता है मन का शुद्धिकरण कथा की सार्थकता तब ही सिद्ध होती है जब इसे हम अपने जीवन व व्यवहार में धारण कर निरंतर हरि स्मरण करते हैं। अपने जीवन को आनंदमय, मंगलमय बनाकर अपना आत्म कल्याण करें। अन्यथा यह कथा केवल मनोरंजन, कानों के रस तक ही सीमित रह जाएगी। भागवत कथा से मन का शुद्धिकरण होता है। इससे संशय दूर होता है और शांति व मुक्ति मिलती है। यह बात शिवालय मंदिर गांधी बाजार में चल रही संगीतमयी श्रीमद‌् भागवत कथा में गुरुवार को पं.नंदकिशोर देवलिया ने कथा का वाचन करते हुए कही। उन्होंने कहा कि श्रीमद‌् भागवत कथा श्रवण से जन्म जन्मांतर के विकार नष्ट हो जाते हैं। जहां अन्य युगों में धर्म लाभ एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए कड़े प्रयास करने पड़ते हैं, कलियुग में कथा सुनने मात्र से व्यक्ति भवसागर से पार हो जाता है। सोया हुआ ज्ञान वैराग्य कथा श्रवण से जाग्रत हो जाता है। कथा कल्पवृक्ष के समान है, जिससे सभी इच्छाओं की पूर्ति की जा सकती है। उन्होंने कहा कि भागवत पुराण हिन्दुओं के अट्ठारह पुराणों में से एक है। इसे श्रीमद् भागवत या केवल भागवतम् भी कहते हैं। इसका मुख्य विषय भक्ति योग है, जिसमें श्...