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Kabirji and wife Loyee

कबीर जी और लोई

एक बार बारिश के मौसम में कुछ साधू-महात्मा अचानक कबीर जी के घर आ गये ! बारिश के कारण कबीर साहब जी बाज़ार में कपडा बेचने नही जा सके और घर पर खाना भी काफी नही था !उन्होंने अपनी पत्नी लोई से पूछा -क्या कोई दुकानदार कुछ आटा -दाल हमें उधार दे देगा जिसे हम बाद में कपडा बेचकर चुका देगे !पर एक गरीब जुलाहे को भला कौन उधार देता जिसकी कोई अपनी निश्चित आय भी नही थी ! लोई कुछ दुकानो पर सामान लेने गई पर सभी ने नकद पैसे मांगे आखिर एक दुकानदार ने उधार देने के लिये उनके सामने एक शर्त रखी कि अगर वह एक रात उसके साथ बितायेगी तो वह उधार दे सकता है !इस शर्त पर लोई को बहुत बुरा तो लगा लेकिन वह खामोश रही जितना आटा-दाल उन्हें चाहिये था दुकानदार ने दे दिया !

जल्दी से घर आकर लोई ने खाना बनाया और जो दुकानदार से बात हुई थी कबीर साहब को बता दी ! रात होने पर कबीर साहब ने लोई से कहा कि दुकानदार का क़र्ज़ चुकाने का समय आ गया है ; चिंता मत करना सब ठीक हो जायेगा !जब वह तैयार हो कर जाने लगी कबीर जी बोले क़ि बारिश हो रही है और गली कीचड़ से भरी है तुम कम्बल ओढ़ लो मै तुमे कंधे पर उठाकर ले चलता हूँ ! जब दोनों दुकानदार के घर पर पहुचे लोई अन्दर चली और कबीर जी दरवाजे के बाहर उनका इंतज़ार करने लगे !लोई को देखकर दुकानदार बहुत खुश हुआ पर जब उसने देखा कि बारिश बावजूद न तो लोई के कपडे भीगे है ओर ना ही पाँव तो उसे बहुत हैरानी हुई !उसने पूछा -यह क्या बात है क़ि कीचड़ से भरी गली में से तुम आई हो फि भी तुमारे पावो पर कीचड़ का एक दाग भी नही ! तब लोई ने जवाब दिया -इसमें हैरानी की कोई बात नही मेरे पति मुझे कम्बल ओढा कर अपने कंधे पर बिठाकर यहाँ पर लाये है !यह सुनकर दूकानदार बहुत चकित रह गया ;लोई का निर्मल और निष्पाप चेहरा देखकर वह बहुत प्रभावित हुआ और आश्चर्य से उसे देखता रहा !जब लोई ने कहा कि उसके पति कबीर साहब जी उसे वापस ले जाने के लिये बाहर इंतज़ार कर रहे है तो दुकानदार अपनी नीचता और कबीर साहब जी की महानता को देख-देख कर शर्म से पानी-पानी हो गया ! उसने लोई और कबीर साहब जी दोनों से घुटने टेक कर क्षमा मांगी !कबीर साहब जी ने उसको क्षमा कर दिया !
दुकानदार कबीर जी के दिखाये हुए मार्ग पर चल पड़ा जो कि था परमार्थ का मार्ग और समय के साथ उनके प्रेमी भक्तो में गिना जाना लगा ;भटके हुए जीवो को सही रास्ते पर लाने के लिए संतो के अपने ही तरीके होते है ! संत ने छोड़े संतई चाहे कोटिक मिले असंत ; चन्दन विष व्यामत नही लिपटे रहत भुजंग ! पूर्ण संत हर काल में हर किसी की मनकी मैल और विकारो को मिटाकर एवं प्रभु का ज्ञान करवाकर प्रभु की कृपादर्ष्टि का पात्र बनाता है!

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